एकादशी व्रत हो संसद में 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

पानी और किसानी संकट में है। तमिलनाडु के किसानों ने बार-बार जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन कर इसे अभिव्यक्ति दी। मध्य प्रदेश के किसानों ने मंदसौर में सरकारी बन्दूक से निकली गोलियों का सामना किया। वामपंथी संगठनों ने भी खेती किसानी की संकट को दूर करने के लिए आवाजें उठाई हैं। योगेन्द्र यादव देश भर के तमाम किसान संगठनों को एकजुट कर संघर्ष की धार तेज करने में लगे हैं। किसानों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से जवाब तलब करने वाले महाराष्ट्र के नेता नानाभाऊ पटोले देश के सौ से ज्यादा संगठनों को एकजुट कर संसद का घेराव कर रहे हैं। इन आवाजों के मुखर होने से पहले ही निति आयोग के बाबू अरविन्द पनगड़िया ने अपने एक मित्र के साथ मिलकर वह किताब लिखी थी, जिसमें कहा गया कि किसानों की आत्महत्या दूसरे सेक्टर में होने वाली ऐसी मौत की तुलना में काफी कम है। उन्होंने देश की जनसंख्या का 53 फीसदी हिस्सा कृषि कार्य में संलग्न मान कर ऐसा निष्कर्ष निकाला। इस आंकड़े में वो लोग भी शामिल हैं, जो अमिताभ बच्चन की तरह बाराबंकी में कृषि भूमि खरीद कर किसान होने का दावा पेश कर सकते हैं। हालांकि भारत सरकार ने साल में 180 दिन खेती किसानी में लगे लोगों को ही कृषक माना है। और 2011 की जनगणना में ऐसे किसान सिर्फ आठ प्रतिशत हैं। इस दशा में निति आयोग के बाबू की मंशा स्पष्ट हो जाती है। साथ ही यह भी कि कृषि ऋण माफी, फसल बीमा, लागत का डेढ़ गुणा मूल्य और ई मंडी जैसी स्कीम से किसानों के अच्छे दिनों का ख्वाब पूरा नहीं हुआ।
देश के पानीदार लोगों की दशा गंगापुत्रों की व्यथा कथा कहती है। सोलहवीं लोकसभा चुनाव के केंद्र में गंगा की पुकार रही। नरेंद्र मोदी की वह स्वीकारोक्ति और अरविन्द केजरीवाल का बनारस पहुंचना महज संयोग नहीं था। गंगा का तट कुरूक्षेत्र का मैदान बन गया। सरकार नमामि गंगे का मंत्र जाप कर रही है। यह कुल बीस हजार करोड़ रुपये की परियोजना है। अब लालकिला की तरह गंगा का घाट पाट भी देश के उद्योगपतियों ने गोद ले लिया है। जलयान चलाने के लिए बेताब बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने धीरज धारण कर रखा है। नदियों को जोड़ने की कवायद के साथ ही इन बेजान नदियों के लिए रैली निकालने वाले सदगुरु के सघन वृक्षारोपण अभियान की सफलता भी उनके लिए मायने रखती है। इन सभी परियोजनाओं का राजनीतिक अर्थशास्त्र कम से कम पांच लाख करोड़ रुपये का है। इसी बीच बनारस के मल्लाह विकास की आंधी को चुनौती देने के लिए खड़े होते हैं। एक दिन इसी जमीन पर गंगा मुक्ति आंदोलन के प्रणेता बाबा नागनाथ शहीद हुए थे। देश भर के पर्यावरण वैज्ञानिकों में अगुवा गुरु दास अग्रवाल संन्यासी हो गए। हाल ही में वह 111 दिनों के अनशन के बाद इस दुनिया से विदा हो चुके हैं। गंगापुत्र निगमानंद के नाम पर बनी सेना के नायक गोपाल दास का सत्याग्रह बदस्तूर जारी है। दक्षिणपंथी विचारकों ने इसे संन्यासी विद्रोह कह कर इन पानीदार लोगों के बलिदान का समर्थन ही किया है। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह इन आंदोलनों को एकजुट करने के लिए गंगोत्री से गंगासागर तक की सदभावना यात्रा में जी जान से लगे हैं।
पानी और किसानी के हित में जंग जारी है। हालांकि इन दोनों का अन्योनाश्रय संबंध जगजाहिर है। पर इन आंदोलनकारी समूहों के बीच ऐसा ही संबंध नहीं कायम हो सका है। ऐसा नहीं होने से सत्तारूढ़ गठबंधन ही लाभान्वित होती रहेगी। बीते 4 अक्टूबर को कांग्रेस मुख्यालय में गांव और किसान से जुड़े इन्हीं सब मसले पर परिचर्चा हुई थी। इसमें उठी दो बातों पर हालांकि मीडिया में खुल कर चर्चा नहीं हो सकी है। पर गांव देहात के लोगों तक बातें पहुंचने लगी है। इस मंच से चीनी विचारक कन्फ्यूसियस की बात उभरती है कि आप जब-जब पानी पीते हैं, तब-तब उस सोते को याद करिये, जहां से पानी बहता है। सभी सहभागियों ने ध्वनि मत से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया कि जब-जब अन्न ग्रहण करते हैं, तब-तब उसको याद करें, जो उस अन्न का निर्माण करता है खेतों में, जो बीज बोता है, जो निकौनी करता है और फिर उस फसल को काट कर रसोई घर तक पहुंचाता है। इनसे जुड़ी सभी समस्याओं को सम्बोधित करने के लिए दस दिनों तक संसद में चर्चा हो, जिसमें कोई भी सवाल अछूता नहीं रहे। नानाभाऊ पटोले ने पत्रकार पी.साईंनाथ की इस मांग के पक्ष में आवाज बुलंद कर सभी किसान संगठनों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया है।
किसान संगठनों की एकजुटता का मामला एक सर्वमान्य किसान नेता खोजने की कोशिश में सिमटती जा रही है। गौर करने की बात है कि नरेंद्र मोदी से हुए मतभेद के बाद लोकसभा और भाजपा की सदस्यता त्यागने वाले पूर्व सांसद को कांग्रेस पार्टी ने वर्षों से बंद पड़े किसान मजदूर कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया है। 23 अक्टूबर की जवाब दो-हिसाब दो रैली में देश के सभी हिस्सों से किसानों के रहनुमाओं के जमा होने की संभावना है। राहुल गांधी ने इस रैली के निर्णय का स्वागत किया है। परंतु इसमें भाग नहीं लेने की बात कही है। ऐसा करने से नानाभाऊ पटोले के नेतृत्व में देश भर के किसान संगठनों को दलीय राजनीति की परिधि से उपर उठकर एकत्रित होने में सहूलियत हो सकती है। आज वह भाजपा में होने वाले विद्रोह के प्रतिनिधि स्वर हैं। संभव है कि यशवंत सिन्हा, अरूण शौरी और संजय जोशी जैसे नेता उनके साथ मंचासीन हों। पर क्या यह शक्ति प्रदर्शन पटोले को किसानों के सर्वमान्य नेता के रुप में स्थापित करेगा? इस सवाल का जवाब तो वक्त ही बताएगा। पर सत्ता पक्ष के लोग इस तरह के किसी ध्रुवीकरण को तीतर-बीतर करने में कैसे माहिर हैं, इसका व्यौरा साझी विरासत की पैरोकारी से लेकर तीसरे मोर्चे की कवायद तक पसरी है।
पानी और किसानी के संकट को दूर करने की नीयत से सत्याग्रह और शक्ति प्रदर्शन में लगी जमात के लोग जलपुरुष राजेन्द्र सिंह और नानाभाऊ पटोले की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। गांधीवादी तरीके से रेगिस्तान में जलाशय और नदियां उगाने वाले जननायक आज गंगापुत्र सानंद के बलिदान से आहत हैं। अब तो एकादशी व्रत हो संसद में तभी यह आह मिट सकेगी। इसके पहले दिन बाबा नागनाथ से लेकर स्वामी सानंद तक अकाल मौत का शिकार हुए सभी गंगापुत्रों की मौत का मातम मनाया जाय। उसके बाद दस दिनों तक पानी और किसानी के संकट को संबोधित किया जाय। इस अभियान के समर्थकों ने सांसदों को दलीय राजनीति की सीमाओं से उपर उठकर इस मुद्दे पर आम सहमति कायम करने का प्रयास शुरू किया है। नवरात्रि में आराधना करने वाले सांसदों के लिए यह उत्सव सरीखा हो सकता है।
(कौशल किशोर ‘दी होली गंगा’ पुस्तक के लेखक और पंचायत संदेश के प्रबंध संपादक हैं)

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Mombattiwala or Mohabbatwala

KULDIPNAYAR

Kuldip Nayar  (Pic. Credit: The Hindu)

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Someone has called him the Mombattiwala. He used to visit the Indo-Pak border every year with the candle to celebrate his birthday and to nourish that hope. It’s coincidental that the day falls on 14th August, the independence day in Pakistan, what’s not coincidental is his weekly column Between the Lines, his autobiography Beyond the Lines, and this ritual of torching candle precisely where it used to take place. These are a few of the reasons that made him one of the most loved Punjabis across that fateful Lines. And this love with the Lines reflects more clearly in some of his works as well. The Urdu was his first love. He has often mentioned that his carrier as a journalist started in the late forties from Anjam, the end. Perhaps one can neither find the Veera (Hero) nor that Zara, but still this love story of the Mombattiwala is still waiting for the end of his dreams.

I prefer to refer to Kuldip Nayar as the tallest Punjabi I’ve actually come across face-to-face. Lala Lajpat Rai and Justice Rajinder Sachar were a couple of others connecting us together. We were going to talk about Ehshas-e-Nihan: Khirad-o-Rawayat. This is a collection of ghazals on the hidden feelings in the light of intellect and tradition by one of our common poet friends Shyam Sunder. In this tribute I am going to share about our past and future interactions. The initial occasion started during the two days roundtable conference on Agony of Ganga in July 2012 at the India International Centre. During the lunch break, I found him busy with some of the Ganga activists in the lobby, where I have brought my friends to talk to. Suddenly one of the activists from his table came to me and said, “Nayar Sahib wants to meet you.” I turned left only to verify. His smiling first glance is still fresh in my memory.

I went there to join him delightfully. It was surprising to know that he was aware of my works more like a series of adventurous acts including the fact that Nainital High Court has taken cognisance of contempt against me and the case was pending for almost a decade. This is the sordid saga that a munsif or a judge in the lower court is entitled to pass order against the verdicts of the high court and the supreme court, and when I have raised this issue in a public interest litigation the judge was glad to take cognisance of contempt against me. I told him that I prefer to argue in person and the judges preferred to leave the court before the argument. I further disclosed that I don’t like talking on this topic since the death of my friends from that battlefield. He wrote the address and mobile number on a little piece of paper before giving me, and invited me to his place. Missing the loved ones can make anyone uncomfortable. So I never thought about the meeting. After many moons, we bump into each other in the gangway at the same centre. He said, “You didn’t come.” This time I replied, “I definitely will come tomorrow.” Next day we were together for a couple of hours at his home in Vasant Vihar. By the end of our talks his wife Bharatiji also joined us. I felt comfortable talking most uncomforting topic. Today, I remember him as the rare expert to change hats as well as adjusting heights simultaneously.

Kuldip Nayar loved words. He wanted to be a poet (shayar) in his twenties. He used to be the second generation of Arya Samaja closely linked with Servants of the People Society founded by Lala Lajpat Rai in 1921. He was the manager of United News of India in 1960s. The society is publisher of the Odia daily Samaja, and owns stake in UNI. SoPS has nominated me to represent them in its board in December 2014. Here, we’ve found the best helping hand in him. There were challenges before the news agency. Some of them are still there. His departure is an irreparable loss for this news agancy. Both, Nayar and Sachar were dreaming the publication of the Samaja in Hindi from New Delhi.

Last couple of occasions were memorial lectures of his father-in-law, Bhim Sen Sachar. He was presiding the dais when Justice T.S. Thakur has delivered that lecture on 1st December 2016. That day I reached an hour before the scheduled time with a view to have a little talk with Justice Rajinder Sachar. He has chaired the 150th anniversary of Lalaji that I’ve hosted. I wanted to produce his presidential address in my upcoming book. That day once again Nayar Sahib has called me. This time I have told him about the dialogue series in All India Panchayat Parishad and invited for the lecture, now not possible. We focused on 1965 war, Shastriji and Balvantray Mehta. Then, last year in that lecture Narayana Murthy was the chief guest on 8th December. The dreams of his Balvantray Mehta Memorial lecture and interview on the Pakistan series are now not going to be fulfilled.

BhimSenMemorialLecture

One day his love appeared in the upper house of Parliament when former Prime Minister, Atal Bihari Vajpayee has used ‘Pakistan’ in order to refer to the chair in his absentia. On the other day they were sitting next to each other in the bus leading towards Lahore. He was true to say that there will be none, after his departure, to talk about this love for unity and fraternity among neighbours beyond that Line. All roads are leading towards Rome alone. In the last six years before the final call, he used to be the President of the South Asian Fraternity that was founded by the leaders like A.B. Vajpayee, I.K. Gujral, Krishna Kant, and social activists like Satya Pal Grover before the advent of globalisation. The proponent of Gujral doctrine was his immediate predecessor. He was the tallest figure among journalists of Independent India. In fact he was the first journalist to report from the ground zero in case of the assassination of Mahatma Gandhi in 1948 and the controversial death of Lal Bahadur Shastri in 1966. Immigrants or Vote Banks was his last published column or last question that you can decide. He left the mortal coil on the night, and next morning it appeared in several newspapers. Nayar Sahib wrote tribute to the former Prime Minister, A.B. Vajpayee after the demise that remained unpublished on his table.

Kuldip Nayar was scheduled to preside over the book launching ceremony of Ehshas-e-Nihan: Khirad-o-Rawayat. Here, in this series of conversations, the Mohabbatwala emerged out of that Mombattiwala, who used to light one of the darkest nights between the two brightest days of the Indian subcontinent. I wrote a few letters to the experts a couple of weeks before the goodbye! Sadly, I’m not able to comment on the fact that he has once desired to arrange this event before 15th August. He has left the legacy. It reflects in the efforts of Aaghaz-e-Dosti and Aman ki Asha, across the Lines peace programs. We hope to remember him on the martyrdom of Balvantray Mehta this 19th September.

RIP Kuldip Nayar.jpg

Kuldip Nayar Memorial at Siri Fort Auditorium

मोमबत्तीवाला या मोहब्बतवाला

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

किसी सज्जन ने उनको मोमबत्तीवाला कह कर संबोधित किया। वह हर साल अपने जन्मदिन पर भारत-पाकिस्तान सीमा पर मोमबत्ती जला कर अमन की आशा करते थे। यह महज संयोग है कि 14 अगस्त को पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। पर कई बातें संयोग नहीं है। उनका साप्ताहिक स्तंभ ‘बिटवीन द लाईंस’, उनकी आत्मकथा ‘बियाॅड द लाईंस’ और मोमबत्ती जलाने का ठीक वह स्थान, जहां यह अनुष्ठान बराबर होता रहा। ये कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी वजह से रेखा के आर-पार वह उन चुनिंदा पंजाबियों में गिने जाते हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा लोगों का प्यार मिला। विभाजन रेखा के आर-पार पसरा यह संसार उनके लेखन कार्यों में भी खूब झलकता है। उर्दू उनका पहला प्यार था। कुलदीप नैयर अक्सर कहते थे कि एक पत्रकार के रूप में उनका आगाज ही अंजाम से हुआ। इस मोहब्बत में कोई वीर और कोई ज़ारा भले नहीं मिले, लेकिन मोमबत्तीवाला की यह प्रेम कहानी आगे भी अपने ही सपनों के अंत की प्रतीक्षा में रहेगी।

वास्तव में रु-ब-रु होने वाले सबसे ऊंचे पंजाबी के तौर पर मैं नैयर साहिब को याद करता हूं। लाला लाजपत राय और जस्टिस राजिंदर सच्चर जैसे विभूतियों के कारण हमारा जुड़ाव बढ़ा। हाल ही में हमने तय किया था कि एहशास-ए-निहां: खिरद-ओ-रवायत पर चर्चा हो। यह हमारे शायर मित्र श्याम सुंदर के आरे-तिरछे पसरे गज़ल और नज्मों का संकलन है। मैं समझता हूं कि इसमें छिपी हुई भावनाओं को बुद्धि और परंपरा की कसौटी पर कसने के प्रयासों का चित्रण है। इस श्रद्धांजलि लेख में हमारे भूत और भविष्य के प्रसंगों को याद करने की जरूरत है। ऐसा पहला अवसर जुलाई 2012 में गंगा की व्यथा विषयक दो दिवसीय गोलमेज सम्मेलन के दौरान उपस्थित हुआ था। दोपहर के भोजन के अवकाश में मैंने उन्हें लॉबी में कुछ गंगा कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त देखा। वहां मैं कुछ दोस्तों से बात करने पहुंचा था। अचानक उनकी मेज से एक व्यक्ति मेरे पास आकर बोले, “नैयर साहिब आपसे बात करना चाहते हैं।” मैं बायीं ओर सत्यापित करने की कोशिश में मुड़ा था। और उनकी वो पहली मुस्कान मेरे जेहन में ऐसे कैद हो गई जैसे कल की ही बात हो।

मैं खुशी-खुशी उनके पास पहुंचा। यह जानकर मुझे हैरत हुई कि उनके पास मेरे बारे में अच्छी खासी जानकारी थी। उन्होंने लगभग एक दशक से नैनीताल हाई कोर्ट में मेरे खिलाफ लंबित कंटेप्ट केस के मामले में पहला सवाल किया। मैंने कहा कि यह शायद एक ऐतिहासिक मामला है कि निचली अदालतों का एक न्यायाधीश उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आदेश कर देता है। जब इस मुद्दे को एक जनहित याचिका में उठाया जाता है तो न्यायाधीश याचिकाकर्ता के खिलाफ ही अवमानना का संज्ञान लेते हैं। मैं खुद ही इस केस में बहस करना पसंद करता हूं और जज साहिब इस बहस के शुरू होने से पहले ही अदालत छोड़ देना पसंद करते हैं। अंत में कहा कि लड़ाई के उस मैदान में मेरे दोस्तों की मौत के बाद इस विषय में बात करना मुझे अच्छा नहीं लगता। उन्होंने कागज का एक छोटा सा टुकड़ा थमाने से पहले उस पर पता और मोबाइल नंबर लिखा और मुझे अपने घर आमंत्रित किया। प्रियजनों की दुखदाई याद किसी को भी असहज कर सकती है। इस मुलाकात के बारे में कभी सोच ही नहीं सका। अर्से के बाद एक दिन हम उसी गलियारे में एक-दूसरे से टकरा गए। उन्होंने कहा, “आप आए नहीं।” इस बार मैंने जवाब दिया, “मैं निश्चिय ही कल आऊंगा।” अगले दिन वसंत विहार स्थित उनके घर पर हम लंबी बातचीत में मशगूल हुए थे। इस भेंटवार्ता के अंत में उनकी पत्नी भारती जी भी शामिल हुईं। उस दिन मैंने असहज करने वाले विषय मे बड़ी सहजता महसूस किया। आज मैं उन्हें एक ऐसे दुर्लभ विशेषज्ञ के रूप में याद करता हूं जो न केवल बदलते विषयों के साथ ठीक सामंजस्य स्थापित करते थे, बल्कि ऊंचाइयों का भी सटीक समायोजन करते थे।

कुलदीप नैयर को शब्दों से प्यार था। जब नवयुवक थे तो शायर बनना चाहते थे। वह दूसरी पीढ़ी के ऐसे आर्य सामजी रहे जो लाला लाजपत राय द्वारा 1921 में स्थापित सोसाइटी – लोक सेवक मंडल से जुड़े थे। 1960 के दशक में वह यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया के प्रबंधक थे। सोसाइटी ओडिया दैनिक समाज का प्रकाशक है, और यूएनआई में एक फीसदी का हिस्सेदार भी। दिसंबर 2014 में समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे इसमें नामित किया गया। यहां हमें उनके रूप में सबसे अच्छा सहयोगी मिला। इस समाचार एजेंसी के सामने पहले से कई चुनौतियां थीं। उनमें से कुछ अब भी शेष हैं। उनका प्रस्थान इस एजेंसी के लिए ऐसा नुकसान है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। नैयर और सच्चर दोनों ही दिल्ली से समाज का हिंदी में प्रकाशन हो, यह सपना भी देखते थे।

उनके ससुर भीम सेन सच्चर की स्मृति में होने वाले वार्षिक व्याख्यान में उनसे आखिरी मुलाकात हुई थी। न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर ने 1 दिसंबर 2016 को इसमें व्याख्यान दिया था। उस शाम अध्यक्षता उन्होंने ही किया था। जस्टिस सच्चर से बात करने के उद्देश्य से मैं निर्धारित समय से एक घंटा पहले ही पहुंच गया था। मुझे उनकी अध्यक्षता में संपन्न हुए लालाजी के 150वें साल के समारोह के संचालन की सेवा मिली थी। और मेरी आने वाली किताब में वह अध्यक्षीय व्याख्यान शामिल करना चाहता था। उस दिन एक बार फिर नैयर साहिब ने मुझे बुलाया। इस बार मैंने उन्हें अखिल भारतीय पंचायत परिषद में शुरू हुए संवाद श्रृंखला के बारे में बताया। एक व्याख्यान के लिए आमंत्रित भी किया था। हमारी चर्चा 1965 के युद्ध, शास्त्री जी और बलवंतराय मेहता पर केंद्रित रही। पिछले साल 8 दिसंबर को इस व्याख्यान में नारायण मूर्ति मुख्य अतिथि थे। बलवंतराय मेहता स्मारक व्याख्यान और पाकिस्तान श्रृंखला वाला साक्षात्कार अब पूरा नहीं हो सकता है।

एक दिन यह मोहब्बत संसद के उच्च सदन में प्रकट होता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनकी अनुपस्थिति में कुर्सी को इंगित कर ‘पाकिस्तान’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे दिन लाहौर जाने वाली बस में दोनों साथ बैठते हैं। यह भी सच है कि इसके बाद रेखा के आर-पार एकता और बंधुत्व की वह बात करने वाला कोई दूसरा नहीं। उनके रास्ते केवल रोम की ओर जाते थे। पिछले छह सालों से वह दक्षिण एशियाई बिरादरी के अध्यक्ष थे। अटल बिहारी वाजपेयी, आई.के. गुजराल, कृष्ण कांत जैसे नेताओं ने सत्य पाल ग्रोवर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता के साथ मिल कर वैश्वीकरण के आगमन से पहले ही इसे शुरू किया था। गुजराल नीति के पुरोधा उनके पहले इस पद पर आसीन थे। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को कलमबद्ध करने वाले पत्रकारों में उनकी गिनती होती रहेगी। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या और 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की विवादास्पद मौत के मामले में सबसे पहले रिपोर्ट करने का काम उनके नाम पर दर्ज है। ‘प्रवासी या वोट बैंक’ को उनका आखिरी प्रकाशित स्तंभ कहें या आखिरी सवाल। यह आप तय करें। चिराग बुझने के बाद जब सुबह हुई तो ये कई पत्रों में छपा था। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की श्रद्धांजलि उनकी मेज पर शेष रह गई।

नैयर साहिब एहशास-ए-निहां: खिरद-ओ-रवायत नामक किताब के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करने वाले थे। संवाद की इस कड़ी मे ऐसा मोहब्बतवाला उभरता है, जो इस उपमहाद्वीप के दो बेहद चमकीले दिनों के बीच की घनी स्याह रात को रौशन करने के कारण मोमबत्तीवाला कहलाता है। इस सिलसिले में कुछ हफ्ते पहले ही मैंने दो खत लिखा था। मैं इस बात पर टिप्पणी करने में सक्षम नहीं हूं कि उन्होंने 15 अगस्त से पहले यह आयोजन करने का जिक्र किया था। हमारे बीच उनकी विरासत है। यह विभाजन रेखा के आर-पार शांति की पहल के ‘आगाज-ए-दोस्ती’ और ‘अमन की आशा’ जैसे प्रयासों में बेहतर प्रकट होता है। 19 सितंबर को हम बलवंतराय मेहता की शहादत पर उन्हें याद करने का विचार रखते हैं।


 

Mobocracy: Where Actually We Arrived?

Kaushal Kishore | Follow @HolyGanga

Swami Agnivesh was subjected to mob lynching. A series of things are everywhere ever since I heard about it from Dr. Vaidik that Tuesday. It was not a faceless mob. The name of youth wing poster-boys from the ruling party is in public. Both the heads of state Draupadi Murmu and Raghubar Das were aware of this yet to be delivered address on the plight of natural resources. The social reformer was engaged in the process of uniting certain public movements of different regions, the dream that Lok Nayak JP had before formation of the PUCL–Public Union for Civil Liberty. He is on this agenda since joining the Gangaputra, Swami Sananda, who has been fasting for Aviral Ganga since 22nd June. The state has fielded C.P. Singh to defend the accused with a bundle of allegations suitable to the Anti-Hindu agenda. Meanwhile scaring visuals of the act repeats on the screens. Fear factor is at its peak. How a bunch of so-called Hindus were beating the monk in saffron robe? It sounds like Lala ki Lathi aur Lala ka Sir (the Hindu’s baton and the Hindu’s head).

What a perfect timing! It happened the moment Supreme Court has issued directives on such horrendous acts of mobocracy. Suddenly the WhatsApp message flashed on mobiles of a couple of hundred people from around Pakur in Jharkhand on 17th July. They were all prepared sleeper-cells or robots to reach the venue performing what the bench headed by the CJI was afraid of. The digital army of New India seems to be invincible in the Facebook and WhatsApp era. Similar mob gathered around the residence of veteran BJP leader L.K. Advani in 2013 when the party was about to declare its campaign head for 16th Lok Sabha. After that more than 65 people died due to mob lynching. The crime record bureau is not keeping an up-to-date report on lynching, however, the PM has referred to the dossier on it in the Town Hall address in 2016. He said, 80% members are fake in the cow protection brigade. Since then onwards there is an outstanding order under Article 256 and 257 of the Constitution. After the verdict, the govt. is all the more serious on amendments in I.P.C., Cr.P.C. and the Evidence Act. to address this crisis. Now the debate on plundering of resources shifted to Anti-Hindu rhetoric. This beauty is the scholasticism that prevails today.

Next morning an article, Faith vs Blind Faith, appeared in the English daily, The Indian Express. Swami Agnivesh and Valson Thampu are coauthors of this brilliant piece. These couple of Indian Protestants from Hinduism & Christianity have bluntly offended the clergy involved in immoral and unlawful acts. They come up with specific evidences and plausible reasoning. I do in fact endorse the idea of religious reform shifting the perception from life-after-death to life-before-death. Here, they have deliberately used the wired term Christian community that purports to define a religion as a community. Sadly these rationalists failed to distinguish the two separate terms. Most of their pains are due to this repeatation of an old misnomer that started with Judaism and nourished with Christianity and Islam only to prove a fact that the two are different sides of the same coin.

Emergence of the Hindu in 19th century India was due to Maharishi Dayananda and his brainchild Arya Samaja. All his monotheism and criticism of idol worship proved the best tools to bring the converted back after purification. In 20th century R.S.S. emerged after fifty years with the same Ghar Vapsi idea shifting the focus on idol worship that further unfolded with the Ram Mandir movement. The politics is all about endeavours to convert the religion thriving on morality neutral clergy and leader into a virtual community. No one can imagine about religion without its dogmas, books and the clergy. Similarly basic ingredients of community are cohabitation, life and people. Community is older than religion; a village or a tribe is an example of the former, and Christian, Islam, etc. are examples of the latter.

Everyone has some convenient facts on Swami Agnivesh. Once I’ve heard him during the Muslim gathering at the Ram Lila ground. In the 17 minutes lecture he preferred to react on the cartoon of the Prophet, and narrated the event how their leader approached the woman known only to humiliate him, before shifting to political-economy of the terror trade. I really had no idea that he will go beyond limits to criticise the hosts. The other noticeable memory from the same night is that the dais coordinator got changed as if it was certain kind of the punishment. Democracy and Constitution are meaningless terms in absence of critics. The PM has recently remembered the poet-saint Kabir at Maghar. He was an excellent critic.

Subodh Kant Sahai, former union minister and President of JP’s brainchild All India Panchayat Parishad, reacts to it. The moment it occurred, he was addressing the public gathering of more than fifty thousands at Littipada not far away from ground zero. He has asked a million dollar question, what could have happened if this mob turned back? It was only possible if they were aware of this lynching of the Hindu monk from Maharishi Dayananda’s order at their mother-land. The next day they were talking to the press together at Ranchi, the state capital. He said to me on phone that they have been friends for last fifty years. Then we shared views on the position of the community that was used to be placed between the poles of Atithi Devo Bhava (guest equals to god) and Vasudhaiva Kutumbakam (one planet home), the political-economy of this series of events, and impact of Bhasmasura that neither spared Advani nor Agnivesh, a couple of staunch Hindus from the cadre of R.S.S. & Arya Samaja. If the crisis prolongs it may prove to be the cause of the civil war. That evening the victim of Pakur lynching has reached JPN Apex Trauma Centre of AIIMS. I went to see him with one of my loveliest friends. Thanks to its head Dr. Rajesh Malhotra for briefing us on his health condition. His assistant Dr. Viplab allowed us to meet their patient. And he opened up with an unusual smile and the usual handshake. I fumbled, “Where actually have we arrived, Swamiji?” He, then, asked the name of my friend next to me. I replied, “This is Shyam.” I wanted to say that Shyam does not stand for black, but for the term Hindu in the Persian and Indian in European language. Shyam Sunder, the poet.

The Hindu used to be the idea of tolerance, acceptance, harmony and love. Unfortunately the opposite of that is occupying the public sphere of the day. The Hindu is not involved in scholastic debate on the Taliban. How can they forget the fact that it was raised in the Parliament? Perhaps! Rahul Gandhi has copiously hugged Narendra Modi in the house. Someone among Hindus was allowed to hallucinate His Holiness instead of the Congress President. Meanwhile the deep state has placed the Bhasmasura to play overtly bringing us face-to-face with Dalitacharya. After Kabir, the Prime Minister should remember martyrdoms of Maharishi, Lalaji and Swami Shradhananda, proponent of back to the Vedas.

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Author is General Secretary (Publication) AIPP-All India Panchayat Parishad and Managing Editor of its monthly journal Panchayat Sandesh | Author of The Holy Ganga (Rupa, 2008) |

पंचायत धाम में धूमधाम से घमासान तक

कल्याणी झा और सिद्धार्थ शंकर झा

आजकल हमारे लिए पंचायत परिषद से जुड़ी बातों की जानकारी का मुख्य श्रोत पंचायत सन्देश और इससे जुड़े लोग हैं। इसी माध्यम से हमें ज्ञात हुआ कि जनवरी के दूसरे हफ्ते में पंचायत धाम में लाल बहादुर शास्त्री के बलिदान दिवस पर शीतला शंकर विजय मिश्र और कौशल किशोर ने अविस्मरणीय व्याख्यान दिया था। उन्होंने शास्त्री जी के जन्म, जीवन और बलिदान से जुड़े ऐसी बातों का जिक्र किया, जिसे आज भी ध्यान में रखना जरुरी है। उस दिन दोनों महानुभावों ने मिल कर भी बीस मिनट का समय नहीं लगाया था। इस अवसर पर अध्यक्षीय भाषण के दरम्यान डा. अशोक चैहान ने शास्त्रीजी के बलिदान से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने के मामले में अखिल भारतीय पंचायत परिषद की रुचि पर प्रकश डाला तो कोषाध्यक्ष जयंतीभाई पटेल ने इस अवसर को महोत्सव में बदलने की अहमियत पर गौर फरमाया। 

पंचायत धाम में फिर 21 जनवरी को पंचायत के लाल का जन्मोत्सव धूम-धाम से मनाया गया। डा. लाल सिंह त्यागी ने ही बलवंतराय मेहता पंचायत भवन को पंचायत धाम नामक तीर्थ की उपमा दी। उन्होंने ही जयप्रकाश नारायण और पंडित बिनोदानंद झा जैसे गांधीवादियों द्वारा स्थापित त्रिस्तरीय पंचायती राज के जनक शहीद शिरोमणिDrTyagi108 बलवंतराय मेहता की स्मृतियों को सहेजने के लिए स्थापित इस पीठ को पंचम पीठ की संज्ञा देकर भारतीय समाज को प्रेरित करने का काम किया था। अखिल भारतीय पंचायत परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुबोध कांत सहाय ने 21वीं सदी में इसे साकार करने की योजनाओं को कार्यरु
प देने के लिए शीतला शंकर विजय मिश्र और कौशल किशोर को जिम्मेदारी सौंपी। परिणामस्वरुप पंचायत धाम में 2 जुलाई 2016 से लगातार चर्चाएं चल रही हैं। उन्होंने देश के अलग-अलग भागों में इस मामले पर जन जागृति अभियान का सूत्रपात किया है। त्यागी जी के जन्मोत्सव पर हुए आयोजन से स्पष्ट होता है कि इसमें सभी तरह के विचारधाराओं के समर्थक भाग लेते हैं। इस अवसर पर सामयिक वार्ता के प्रबंध संपादक महेश जी के पहुंचने से किशन पटनायक और डा. लाल सिंह त्यागी की मैत्री का जिक्र होता है तो समाजवादी विचारक गोविन्द यादव द्वारा वर्तमान परिदृष्य और भविष्य के मार्ग पर प्रकाश डाला जाता है। ललित जोशी जैसे विद्वान भाजपा सरकार के दौर में परिषद को उन्नतिपथ पर कायम रखने की कोशिश करते हैं। 

अखिल भारतीय पंचायत परिषद और बलवंतराय मेहता पंचायती राज फाउंडेशन में 19 फरवरी को पंचायत दिवस मनाने का रिवाज है। हमें अब तक यह नहीं ज्ञात हो सका कि वास्तव में किसने मेहताजी का जन्मोत्सव पंचायत दिवस के रुप में मनाने की पैरवी किया था। परंतु यह इस संस्थान के वार्षिकोत्सव की तरह वर्षों से मनाया जाता है। यद्यपि इस अवसर पर सार्वजनिक जीवन में पंचायत और स्वराज से जुड़े मामलों में सक्रिय लोगों की अहम भागीदारी होती रही, परंतु इस वर्ष पंचायती राज मंत्रालय में सेवारत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को मुख्य अतिथि बनाया गया था। इससे एक प्रश्न खड़ा होता है कि क्या अब पंचायत परिषद में पंचायतों से जुड़े लोगों का रुझान कम हो रहा है? इस प्रश्न को हल करने के क्रम में कई ऐसी बातें सामने आती हैं, जिन्हें जानकर हैरत होती है। पिछले साल के अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश राज्य पंचायत परिषद के पदाधिकारियों ने अलीगढ़ में सम्मेलन किया था, जिसमें गुजरात में अगला राज्य सम्मेलन करने की घोषणा किया गया। परंतु यह अभी तक नहीं हो सका है। गुजरात के पदाधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुबोध कांत सहाय को कोई पंचायती नेता नहीं मानता है। राजीव गांधी की हत्या का प्रसंग छेड़ते हुए उनके कांग्रेसी होने पर भी शंका किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक ऐसी कहानी सामने आती है, जिसे जानकर पंचायतों की राजनीति में सक्रिय लोगों को भारी निराशा होती है। मनोज सिंह जादौन और बाल्मीकि प्रसाद सिंह द्वारा चलाए जा रहे ऐसे कार्यक्रमों का खुलासा होता है, जो मेहता और जय प्रकाश जैसे विभूतियों की छवि धूमिल करती है। साथ ही अखिल भारतीय पंचायत परिषद से सज्जन लोगों को दूर करने का प्रयास करती प्रतीत होती है। 

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आजकल बाल्मीकि प्रसाद सिंह और उनकी मंडली ने पता बताना शुरु किया है, पंचायत धाम के गेट पर। 30 मार्च 2017 की शाम उन्होंने पंचायत धाम के बंद गेट पर धरना शुरु किया। बैनर और छप्पर टांग कर इसे जंतर-मंतर की तरह धरनास्थल में परिवर्तित कर दिया। फिर

Balmiki

Controversial Panchayati Leader Balmiki Prasad Singh at AIPP gate

यहां एक और बैनर भी लगाया जाता है, जिसे पंचायत परिषद के महासचिव (विधि) अनिल शर्मा की ओर से जारी किया गया है। इसमें ठगों से सावधान रहने की सूचना देने के क्रम में बाल्मीकि प्रसाद सिंह की तस्वीर के साथ उनके काले कारनामों का व्यौरा दर्ज है। मीडिया के कुछ लोग उनकी मंडली से अनिश्चितकालीन धरना के बारे में बातें करने भी पहुंचे। फिर इस मामले में अफवाहों का प्रसारण हुआ। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के एक पत्रकार ने परिषद के वास्तविक पदाधिकारियों से बात कर दूसरा पक्ष भी रखने का काम किया है। परंतु यह बड़े दुख की बात है कि मीडिया की सत्यनिष्ठा पर प्रश्न उठे। स्वतंत्र भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज के जनक अमर शहीद बलवंतराय मेहता और लोक नायक जयप्रकाश नारायण जैसे गांधीवादियों की परिषद के लिए भी यह बड़े दुर्भाग्य की बात है। पंचायत परिषद के विषय में खबरें प्रकाशित करने से पहले इसे ठीक से जानना जरुरी है। हमने इस विषय में फाउंडेशन के ट्रस्टी और इन संस्थानों के मुख पत्र ‘पंचायत संदेश’ के प्रबंध संपादक से संपर्क किया। उनकी दी जानकारियों को खंगाल कर हमने इस विषय में सही समझ कायम करने की कोशिश किया है। 

पंडित बिनोदानंद झा, डा. लाल सिंह त्यागी और बलवंतराय मेहता ने लाल बहादूर शास्त्री और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के निर्देशानुसार त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिलवाने एवं देशभर की पंचायतों को एक सूत्र में बांधने के उद्देश्य से अखिल भारतीय पंचायत परिषद का सूत्रपात किया। यह महान कार्य 12 अप्रैल 1958 को झारखंड के जसीडीह में संपन्न हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में हुआ था। और फिर भूदान आंदोलन के दौर में इसका विकास बलवंतराय मेहता की शहादत के बाद हुआ। 1966 में जयप्रकाश नारायण ने अमर शहीद मेहता की स्मृति में बलवंतराय मेहता पंचायती राज फाउंडेशन की स्थापना किया था। इसके लिए 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अपील भी मौलिक है। उसी साल भूदान में इसके लिए जमीन मिली थी। और बीस साल बाद 1986 में यह मुख्यालय पंचायत धाम (मयूर विहार फेज 1) में स्थानांतरित हुआ था। उन्होंने वास्तव में पंचायतों के लिए एक स्वायत्तशासी, लोकतांत्रिक और गैर-राजनीतिक संस्थान बनाने का काम किया था। यह परिषद राज्यों में स्थित पंचायत परिषदों के साथ मिलकर देशभर की पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने का कार्य करती है। तीसरी सरकार को परिभाषित करने में इस परिषद की अहम भूमिका रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरुप जनवरी 1961 में इसका संविधान लागू हुआ। इसके तहत तीन प्रतिशत ब्लाॅक के प्रतिनिधियों को इसकी काउंसिल के लिए नामित करने हेतु राज्य परिषदों को अधिकृत किया गया है। संविधान के प्रावधानों के तहत काउंसिल के सदस्य आम सहमति से अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। 

सन 2003 से सुबोध कांत सहाय अखिल भारतीय पंचायत परिषद के निर्विरोध निर्वाचित अध्यक्ष चले आ रहे हैं। उन्होंने तीन बार लगातार चुनाव जीतकर यह मुकाम हासिल किया है। उनका कार्यकाल दिसंबर 2018 तक शेष है। गौर करने की बात है कि उनकी अध्यक्षता पर प्रश्न होने के बावजूद भी कोई मामला किसी न्यायालय में नहीं चल रहा है। अलबत्ता बाल्मीकि प्रसाद सिंह और उनकी मंडली के लोग कई आपराधिक मामलों में लिप्त हैं, जिसका खुलासा सीबीआई तक की रिपोर्ट से होता है। आखिरी बार 22 दिसंबर 2013 को हुई पंचायत परिषद की महासमिति की बैठक में उनके निष्कासन की पुष्टि हुई थी। 

1986 से अखिल भारतीय पंचायत परिषद का मुख्यालय बलवंतराय मेहता पंचायत भवन में चला आ रहा है, जो मयूर विहार फेज 1 में स्थित है। वास्तव में यह बलवंतराय मेहता पंचायती राज फाउंडेशन की सम्पत्ति है। इसके ट्रस्टी और सचिव शीतला शंकर विजय मिश्र इससे जुड़ी तमाम बातों के विषय में जानकारियों के अधिकृत पदाधिकारी हैं। पंचायत धाम स्थित उनके कार्यालय से आसानी से संपर्क किया जा सकता है। 

सीबीआई रिकार्ड में करोड़ों की हेराफेरी करने के मामले में अभियुक्त मनोज सिंह जादौन ने बाल्मीकि प्रसाद सिंह को पंचायत परिषद की जमीन कब्जाने के लिए गांधी का नया अवतार बनाने का नाटक रचा है। गांधी टोपी और गांधी की लाठी ही नहीं बल्कि मीरा, आभा और सुशीला जैसी महिलाओं के चरित्र पर भी खूब मेहनत किया गया है। आज बापू के सशक्त अभिनय की प्रस्तुति प्रियंवदा, सरिता और रेणु जैसी महिलाओं के सौजन्य से हो रहा है। उन्हें ठीक से प्रशिक्षित कर मैदान में उतारा गया है। दुर्भाग्यवश यह नाटक किसी रंगमंच पर नहीं किया जा रहा है। बल्कि पंचायत धाम के बाहर पिछले एक सप्ताह से दिन-रात जारी है। 

अपनी टीम के साथ बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने बलवंतराय मेहता पंचायत भवन के गेट नंबर एक पर निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए धरना शुरु किया है। इस धरना के विषय में बीते दिनों मीडिया में भ्रामक रिपोर्ट प्रसारित हुई है। इनमें से कुछ रिपोर्ट एक पक्ष की बातों को प्रचारित कर अखिल भारतीय पंचायत परिषद की छवि को धूमिल कर रही है। इस मामले में परिषद की ओर से दोषी मीडिया कंपनी और उससे जुडे़ लोगों को लीगल नोटिस भेजने की बात कही जा रही है। अगले दिन इस मामले में कार्यसमिति ने विचार-विमर्श कर बाल्मीकि प्रसाद सिंह एवं उनके साथियों के विषय में तथ्यपरक जानकारी सार्वजनिक करने का निर्णय लिया गया था। 

बिहार राज्य पंचायत परिषद द्वारा बाल्मीकि प्रसाद सिंह को 1993 में अखिल भारतीय पंचायत परिषद की महासमिति के लिए सदस्य नामित किया गया था। बाद में उन्हें भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का दोषी पाया गया। परिषद विरोधी कृत्यों में संलिप्त होने के कारण 3 अगस्त 2004 को बिहार राज्य परिषद द्वारा बाल्मीकि प्रसाद सिंह को निष्कासित किया जा चुका है। इस निष्कासन के उपरांत उनकी अखिल भारतीय पंचायत परिषद की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। फिर न ही वह अधक्ष्य पद के लिए चुनाव लड़ सकते हैं और न ही किसी चुनाव में मतदान ही कर सकते हैं। इस परिषद के सभी सदस्य इस तथ्य से वाकिफ हैं।

सन 1998 में राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी और बाल्मीकि प्र्रसाद सिंह को अखिल भारतीय पंचायत परिषद का महामंत्री नियुक्त किया गया था। बाद में 17 अक्टूबर 2000 को निष्कासित भी किया गया। इस बीच उन्होंने पंचायत धाम की जमीन लीज पर देना आरंभ किया। उन्होंने रितु कपूर से पांच लाख रुपये लेकर 10000 वर्ग फीट जमीन पट्टे पर दे दिया। साथ ही फाउंडेशन की जमीन को शादी-व्याह के लिए ठेके पर देना, सब्जी मंडी लगाना और पार्किंग जैसे व्यावसायिक कार्याें के लिए उपयोग शुरु किया। कई लोगों को पंचायत धाम की जमीन बेचने और दूसरी तमाम शिकायतें मिलने पर फाउंडेशन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त किया था। तत्कालीन अध्यक्ष श्रीराम तिवारी ने इन आपराधिक तत्वों को परिषद से निष्कासित कर इनके विषय में अखबारों में विज्ञापन भी छपवाया था। इसके बाद ही मनोज कुमार सिंह जादौन और बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने पंचायती राज अनुसंधान एवं विकास परिषद बना कर इसे अखिल भारतीय पंचायत परिषद का अनुसांगिक संस्थान बताकर काले कारनामों को अंजाम देना आरंभ किया। क्या इन कुकृत्यों में अखिल भारतीय पंचायत परिषद् अथवा इसके पदाधिकारियों की कोई भूमिका है? कागजातों के अवलोकन से स्पष्ट है कि परिषद् के अध्यक्ष सुबोध कांत सहाय ने ही इन्हें निष्कासन के बाद पुनः शामिल किया था। 

यहाँ इतनी बात साफ़ है कि बाल्मीकि प्रसाद सिंह, राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी, राम अवध उपाध्याय और मनोज कुमार सिंह जादौन लंबे समय से निजी स्वार्थों की सिद्धि के लिए अखिल भारतीय पंचायत परिषद के नाम का दुरुपयोग करते रहे। परिणामस्वरुप उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले चल रहे हैं। अखिल भारतीय पंचायत परिषद की महासमिति की संस्तुति के बगैर ही बैंकों में खाते खोल कर संस्थान का धन कई बार गबन किया गया। मयूर विहार फेज 1 स्थित आंध्रा बैंक में खाता संख्या 1588101100015160 के माध्यम से इन्होंने 61 लाख 40 हजार रुपये का गबन किया है। इन लोगों ने इसी बैंक में फर्जी कागजातों के बूते दूसरा खाता संख्या 1588101100022993 खोल कर 2 लाख 60 हजार रुपये का गबन किया। मार्च 2011 में आशुतोष मल्टीमीडिया व बालाजी मल्टीमीडिया नामक कंपनी ने इन पर लाखों रुपये अखिल भारतीय पंचायत परिषद के नाम पर ठगने का आरोप लगाया है। इनके अतिरिक्त भी ठगी के कई मामले बाल्मीकि प्रसाद सिंह और उनकी मंडली के सदस्यों के नाम दर्ज हैं। परंतु इनकी गतिविधियों से पुलिस-प्रशासन का रुख समझा जा सकता है। 

सितंबर 2008 के पहले हफ्ते में सीबीआई ने अखिल भारतीय पंचायत परिषद के महासचिव को एक पत्र लिखा था। जांच अधिकारी क्षेत्रपाल धीरज द्वारा जारी पत्र संख्या 3/3(एस)/2008-एससीबी-1/न्यू देलही2868 में पंचायतीराज अनुसंधान एवं विकास परिषद (पताः 167 ए, खिड़की गांव, प्रेस इंक्लेव, मालवीय नगर, नई दिल्ली) का जिक्र किया गया है। इस संस्थान के अध्यक्ष समेत 11 लोगों ने मिल कर आम लोगों को करोड़ो रुपये का चूना लगाया था, जिसमें बाल्मीकि प्रसाद सिंह अहम कड़ी रहे। इन सभी के नाम हैंः मनोज कुमार सिंह जादौन, (2) राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी, (3) निशात नियाजी, (4) डा. नरेंद्र सिंह गौतम, (5) बाल्मीकि प्रसाद सिंह, (6) ए.के. कौल, (7) कमल कांत ओझा, (8) सत्य नारायण शर्मा, (9) नंद किशोर, (10) आई.एस.एन. राजू और (11) संजय राय के नाम शामिल हैं। इनमें से राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी, राजेन्द्र प्रसाद शर्मा और सत्य नारायण शर्मा की मृत्यु हो चुकी है। इन लोगों ने कई अखबारों में विज्ञापन छाप कर लोगों को पंचायत स्टोर के नाम पर नौकरी देने का छांसा दिया। इस क्रम में पंचायतीराज अनुसंधान एवं विकास परिषद के नाम पर 100 रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ आवेदन भेजने को कहा गया था। केंद्र सरकार में तत्कालीन पंचायती राज मंत्री मनीशंकर एैय्यर ने इस घटना का संज्ञान लेकर सीबीआई को जांच सौंप दिया था। सीबीआई की टीम ने इन लोगों के कब्जे से कम से कम तीन करोड़ मूल्य के डिमांड ड्राफ्ट वसूल किये। लोगों से उगाहे वास्तविक रकम का सही आंकड़ा मौजूद नहीं है। इस विषय में मुकदमा संख्या आर.सी3(एस)/2008 (भादसं की धारा 420, 467, 468, 471 एफ) आज भी सीबीआई कोर्ट में लंबित है। इस मामले में सीबीआई ने बाल्मीकि प्रसाद सिंह और उनके साथियों की गतिविधियों का जिक्र करते हुए यह बताने को कहा था कि अखिल भारतीय पंचायत परिषद से इनका क्या संबंध है? उल्लेखनीय है कि इस हेराफेरी की सूचना पाकर बाल्मीकि प्रसाद सिंह, मनोज कुमार सिंह जादौन, राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी और डा. नरेद्र सिंह गौतम, जो अखिल भारतीय पंचायत परिषद से जुड़े थे, उन्हें फिर से निष्कासित किया गया था। 

अखिल भारतीय पंचायत परिषद से निष्कासन और विभिन्न आपराधिक मामलों में संलिप्त होने के बावजूद यह दल बेखौफ घूम रहा है। परिषद के नाम का दुरुपयोग कर लोगों को ठगने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। 2015 में बाल्मीकि प्रसाद सिंह और मंडली द्वारा राजा चैहान, सत्येन्द्र तोमर और अनूप अग्रवाल से मध्य प्रदेश पंचायत परिषद का अध्यक्ष बनाने के नाम पर लाखों-लाख की ठगी की है। इस मामले में भादसं की धारा 420, 467 और 34 के अंतर्गत ग्वालियर थाना (म.प्र.) में एफआइआर संख्या 11/114/2015 पंजीकृत है। इसके अतिरिक्त भी कई मामले हैं। दक्षिणी दिल्ली में हौजखास थाना ने बीस लाख की जालसाजी का मामला एफआईआर संख्या 235/28.02.2015 भादसं की धारा 420, 467, 471 और 34 के अंतर्गत पंजीकृत किया है। 2016 में 8 अक्टूबर को पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर थाना में वेद प्रकाश शर्मा ने ठगी का मामला (डी.डी. नंबर 51बी) दर्ज कराया है। 

बाल्मीकि प्रसाद सिंह की आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता के मामले विचाराधीन हैं। उनका अथवा उनके साथियों का अखिल भारतीय पंचायत परिषद से कोई ताल्लुक नहीं है। परिषद के दफ्तर में अवैध धुसपैठ और चोरी करने के कई मामले भी दर्ज किए जा चुके हैं। 30 सितंबर 2015 को पंचायत धाम में ताला काट कर कब्जा करने का मामला सामने आया था। इस विषय में भादसं की धारा 341, 506, 448 और 34 में एफआइआर संख्या 698/2015 पांडव नगर थाना में दर्ज है। हाल ही में 23 मार्च 2017 को इसी थाना में एफआइआर संख्या 98/2017 दर्ज किया गया है। इनसे जुड़े लंबित मामलों का विवरण थाना और न्यायालय से किया जा सकता है। 

इन कारनामों को अंजाम देने में लगे बाल्मीकि प्रसाद सिंह की गतिविधियों पर शासन-प्रशासन का रुख हताश करने वाला है। संभव है कि राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और डा. नरेन्द्र सिंह तोमर जैसे केन्द्र सरकार के मंत्रियों को अपना आका बताने वाले बाल्मीकि प्रसाद सिंह पुलिस पर रौब गांठने में सफल हो रहे हों। परन्तु माननीय मंत्रियों ने इस विषय में कोई सकारात्मक कार्यवाही किया हो यह भी जमीन पर दिख नहीं रहा है। साथ ही सड़क पर चल रहे इस तमाशा को देखने में लगे लोग तथाकथित गांधी के ‘वाकिंग स्टिक’ का करतब देख कर आश्चर्यचकित हैं। वस्तुतः इस लड़ाई के लंबे अर्से से जारी रहने की तह में दूसरी बातें भी हैं। पिछले तीन चुनावों में अखिल भारतीय पंचायत परिषद के संविधान का अनुपालन सुनिश्चित करना जरुरी नहीं समझा गया। दरअसल परिषद के अध्यक्ष को ग्राम सभा का मतदाता होना चाहिए। साथ ही इसके संविधान में वर्णित गैर-राजनैतिक संस्थान की छवि को बरकरार रखने के लिए पूर्व अध्यक्षों की तरह वर्तमान अध्यक्ष को कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देना जरुरी था। इस विषय  में अब तक कोई संविधान संशोधन भी नहीं किया गया है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर ग्रामसभाओं के सदस्य पंचायत परिषद को निहित स्वार्थों की पूर्ति में लगे तत्वों से बचाने की मुहिम का समर्थन करते हैं। 

AIPP-Gate

https://www.docdroid.net/eqdsw7a/ps-decmber-2016.pdf

नेता घूमे लंदन में

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खेती किसानी संकट में
नेता घूमे लंदन में

विश्व भ्रमण के चक्कर में
नेता घूमे लंदन में

धरती की हरियाली संकट में
आ नेता घूमे लंदन में

गंगा की रवानी संकट में
नेता घूमे लंदन में

मरे गंगापुत्र भी संकट में
आ नेता घूमे लंदन में

पानी किसानी संकट में
नेता घूमे लंदन में

हर जगह तबाही मंजर में
आ नेता घूमे लंदन में

एकादशी व्रत हो संसद में
नेता घूमे लंदन में

खेती किसानी संकट में
नेता घूमे लंदन में
श्याम सुंदर जी की कविता नेता घूमे लंदन में
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AIPP Press Conference

Panchayat Dham, 11th September 2018

We are sad to know that doin of environmental engineering in India Pro. G.D. Agarwal (Swami Gyanswaroop Sananda) has been fasting since 22nd June 2018 at Haridwar. After more than 80 days of fasting he is rather week. We request the govt. to pay adequate attention to his cause and begin the process of decommissioning of dams like the developed countries. Managing Editor of Panchayat Sandesh wrote a detailed report on this issue that is enclosed here.

The celebrations of martyrdom of Balvantray Mehta in 1965 Indo-Pak War is more than a mere ritual form Vidya Bhawan to Panchayat Bhawan. His assassination is a mystery in the historical records of the 13th day of that war. He was sitting Chief Minister of Gujarat and President of Servants of the People Society founded by Lala Lajpat Rai in 1921 at the time of his demise in mid air on 19th Sept. 1965. Former Prime Minister I.K. Gujral was fond of his memory. As such he has allocated 3.5 acres of land in South Delhi to start the Balvantray Mehta Vidya Bhawan. He is better known to be the founding father of three-tire Panchayati Raj system in Independent India and subsequently All India Panchayat Parishad; autonomous apex body of Panchayat. In addition to them he was Co-Founder of Bharatiya Vidya Bhawan with K.M. Munsi.

Lal Bahadur Shastri and Lok Nayak Jayprakash Narayan made the nationwide appeals to preserve his memory for future generations. Panchayat Dham or Balvantray Mehta Panchayati Raj Foundation in East Delhi is an outcome of their appeal. This is the Constitutional duty of government in the centre and states to do the needful to preserve the memory of such leaders under Article 51A. Therefore, AIPP appeals from the state and union govt. to help us in this noble cause.

This year, Panchayat Sandesh, the mouthpiece of All India Panchayat Parishad and Balvantray Mehta Panchayati Raj Foundation is going to celebrate his martyrdom with Babu Shivaji Rai Foundation and India International Centre. That afternoon we are going to start new season of the dialogue series i.e. Panchayat me Paricharcha. The keynote address on this occasion will be delivered by veteran social activist Shri Satya Pal Grover, President of South Asian Fraternity. In 1960s, he has started public service under the leadership of Balvantray Mehta and Lal Bahadur Shastri. Moreover he was happened to be the General Secretary of All India Panchayat Parishad between 1961-66 during presidency of the Loknayak JP. As such this is a monumental event in the history of AIPP and BMPRF. The Chief Guest is JD(U) leader and Rajya Sabha member Shri Vashistha Narayan Singh.

Panchayat Sandesh has recently appointed Shri Shyam Sunder as its new editor under the PIB Act. We are also going to launch new collection of his ghazals and nazms i.e. Ehshas-e-Nihan: Khirad-o-Rawayat (Urdu) on this 53rd anniversary of Balvantray Mehta’s martyrdom at Kamla Devi Multipurpose Hall, India International Centre. The Working President of AIPP Dr. Ashok Chauhan, its General Secretary (Publication) Kaushal Kishore, Sangathan Mantri Dhyan Pal Singh and President of Babu Shivaji Ray Foundation Kumar Veer Bhushan introduced the journalist and poet Shyam Sunder on this occasion. Before joining Panchayat Sandesh he was the General Manager at the Hindi monthly Sublog for last six years.

प्रेस विज्ञप्ति

पंचायत धाम, 11 सितंबर 2018
हम यह जानकर दुखी हैं कि भारत में पर्यावरण इंजीनियरिंग के अगुवा माने जाने वाले वैज्ञानिक प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंद) पिछले 22 जून 2018 से हरिद्वार में अनशन कर रहे हैं। 80 दिनों के उपवास के बाद उनके हालत की गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है। गंगा किनारे गांवों में इस विषय में बातें खूब होने लगी है। हम सरकार से इस मामले में तत्काल प्रभावी कार्रवाई करने का अनुरोध करते हैं। गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार को विकसित देशों की तरह बांधों को हटाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहिए। इस मामले में पंचायत संदेश के प्रबंध संपादक की विस्तृत रिपोर्ट यहां संलग्न है।
1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए बलवंतराय मेहता की शहादत का जश्न विद्या भवन से पंचायत भवन तक एक अनुष्ठान मात्र नहीं है। उनकी हत्या का रहस्य उस युद्ध के 13 वें दिन के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में दफन है। बलिदान के समय मेहताजी गुजरात के मुख्यमंत्री और लाला लाजपत राय द्वारा 1921 में स्थापित लोक सेवक मंडल के अध्यक्ष पद पर सुशोभित थे। पूर्व प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल को उनकी स्मृति से विशेष लगाव था। उन्होंने बलवंतराय मेहता विद्या भवन शुरू करने के लिए दक्षिण दिल्ली में 3.5 एकड़ जमीन आवंटित किया था। मेहताजी स्वतंत्र भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली और अखिल भारतीय पंचायत परिषद के जनक माने जाते हैं। इसके अलावा उन्होंने के.एम. मुंशी के साथ भारतीय विद्या भवन स्थापित किया था।
लाल बहादुर शास्त्री और लोक नायक जयप्रकाश नारायण ने आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी स्मृति को सहेजने के लिए राष्ट्रव्यापी अपील किया था। पूर्वी दिल्ली स्थित पंचायत धाम या बलवंतराय मेहता पंचायती राज फाउंडेशन उसी अपील का परिणाम है। ऐसे नेताओं की स्मृति को संरक्षित रखना केंद्र और राज्य की सरकारों का संवैधानिक कर्तव्य है। इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 ए में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है। इसे ध्यान में रख कर अखिल भारतीय पंचायत परिषद राज्य और केंद्र की सरकारों से सहयोग की अपील करता है।
पंचायत संदेश अखिल भारतीय पंचायत परिषद और बलवंतराय मेहता पंचायती राज फाउंडेशन का मुखपत्र है। इस साल पंचायत संदेश बाबू शिवाजी राय फाउंडेशन और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के साथ मिलकर उनका बलिदान दिवस मना रहा है। इस अवसर पर पंचायत में परिचर्चा की नई संवाद श्रृंखला शुरू किया जा रहा है। अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता और दक्षिण एशियाई बिरादरी के अध्यक्ष श्री सत्य पाल ग्रोवर इस अवसर पर मुख्य वक्ता हैं। 1960 के दशक में उन्होंने बलवंतराय मेहता और लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में सार्वजनिक सेवा शुरू की थी । इसके अलावा वो लोकनायक जेपी की अध्यक्षता के दौरान 1961-66 के बीच अखिल भारतीय पंचायत परिषद के महासचिव भी रहे। उनका यह आगमन एआईपीपी और बीएमपीआरएफ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। इस अवसर पर मुख्य अतिथि जेडी (यू) नेता और राज्यसभा सदस्य श्री वशिष्ठ नारायण सिंह होंगे। आगा खां ट्रस्ट फाॅर कल्चर के डायरेक्टर श्री रतीश नंदा और दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर के परिवार से आने वाली दी वीक से जुड़ी श्रीमती मंदिरा नैयर इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों में शामिल हैं।
पंचायत संदेश ने हाल ही में श्री श्याम सुंदर को पीआईबी अधिनियम के तहत संपादक नियुक्त किया है। बलवंतराय मेहता की शहादत के 53वीं वर्षगांठ पर उनकी गजलों और नज्मों का संकलन एहसास-ए-निहां: खिरद -ओ-रवायत (उर्दू) का लोकार्पण भी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमला देवी सभागार में किया जाएगा। इस अवसर पर एआईपीपी के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ अशोक चौहान, इसके महासचिव (प्रकाशन) कौशल किशोर, संगठन मंत्री ध्यान पाल सिंह और बाबू शिवजी राय फाउंडेशन के अध्यक्ष कुमार वीर भूषण ने पत्रकार और कवि श्याम सुंदर जी का परिचय कराया। पंचायत संदेश में शामिल होने से पहले वह पिछले छह सालों से हिंदी मासिक पत्रिका सबलोग में महाप्रबंधक थे।

Immigrants or Vote Banks?

Kuldip Nayar in Between the Lines

The ruling Bharatiya Janata Party (BJP) is well entrenched in six of the seven northeastern states, something not imaginable when partition was discussed. Fakhruddin Ali Ahmed, then a top Congress leader, once admitted that for the sake of votes, the Muslims from neighbouring countries like East Pakistan, now Bangladesh, were brought to Assam. He said that the Congress did it purposely because “we wanted to retain Assam.”

This created a serious problem for the people of the state. Since then the issue of infiltration has loomed large in the northeast, especially in Assam. But then the process to check illegal migration in the northeast, which began during the British Empire, remains unfinished despite various efforts made at the national and state levels.

Consequently, a large scale migration impacted the social, economic, political and environmental segments which led to the people of the northeast voicing concerns. When the Immigrant (Expulsion from Assam) Act 1950 was passed in Parliament, allowing only those people who were displaced because of civil disturbances in East Pakistan into the region, the deportation of people caused much antipathy in West Pakistan. Subsequently, an agreement was signed between Prime Minister Jawaharlal Nehru and Liaquat Ali Khan, which allowed the return of those people deported in 1950 to India.

During the India-China war in 1962, there were reports that some infiltrators with Pakistani flags were seen on the borders, resulting in the Assam Plan which New Delhi adopted to prevent infiltration from Pakistan in 1964. But the continuing atrocities in East Pakistan in the early 70s led to an unchecked entry of refugees into India on a large scale. The Indira Gandhi-Muji-ur Rahman Agreement in 1972 redefined the status of illegal immigrants in India as it declared that all those who had come before 1971 were declared non-Bangladeshis.

The Assamese resented the agreement and launched an agitation, leading to Illegal Migrant (Determination by Tribunal) Act coming into force in 1983. The Act was meant to detect and deport illegal migrants through tribunals. But it could not resolve the perennial immigrant problem in the northeast. Soon after, when the Assam Accord of 1985 was accepted, it fixed the cut-off date to determine illegal migrants in Assam as March 25, 1971, the day Bangladesh was born.

The accord mentioned that all those migrants who had come and settled in the state on or before this date shall be regarded as citizens and those illegal migrants who are found to have arrived in the state after this date are to be expelled in accordance with the law. The rebel groups, coming under the umbrella of AASU, launched a militant struggle against the centre seeking to revoke the accord and instead enact a law that deported all illegal immigrants irrespective of their time of immigration.

However, there was no respite for the locals as the immigrants were clandestinely provided with ration cards and their names were included in the voters’ list. The growing clout of the Bangladeshi immigrants made the situation in Assam worse. In fact, the overall Muslim population in the region has grown to over 40 per cent now, according to an estimate. Ultimately, the Supreme Court had to intervene to set aside Act in 2005. In its judgment, the apex court declared that the Act “has created the biggest hurdle and is the main impediment or barrier in the identification and deportation of illegal migrants.”

However, the infiltration from Bangladesh remains unchecked and illegal immigration continues to be a sensitive issue, exploited by vested political interests. A decade of agitation by northeast rebel groups, both peaceful and violent over the illegal foreign national issue, has not brought concrete success.

Unfortunately, the BJP government at the Centre is bent on bringing an amendment to the Citizenship Act of 1955 which will enable the religiously persecuted migrants to obtain citizenship thus distinguishing them on communal lines. The majority of the people of Assam are against the proposed amendment since it goes against the spirit of the Assam accord which states that all illegal migrants from Bangladesh after 25 March 1971 would be deported.

The Centre should, instead, initiate measures to address some of the pending inter-state issues, especially the boundary dispute of Assam with Nagaland, Mizoram, Arunachal Pradesh as well as Meghalaya. All these states, except Arunachal Pradesh, were carved out of Assam at some stage. Similarly, Manipur also has a boundary problem with Mizoram and Nagaland but they are not as prominent as that of Assam.

Yet, the region is united on many important issues like harassment of people from the northeast, particularly the student community in some parts of the country, including in the national capital. The feeling is of neglect by the Centre and the lack of sincerity which is telling upon the states. They want more involvement of the government in the development of the region. No doubt, the BJP government has introduced several measures for the development, trying to connect with the people of the region emotionally.

But then the Armed Forces Special Power Act (AFSPA) has been a sore point. The Centre has gradually lifted the act from many parts of the region but it can do much more, taking into consideration the ground situation which has improved considerably. Illegal migration will remain a security challenge for India if no adequate measures are taken, including checking and deporting illegal migrants.

The ruling BJP must always remember that the northeast is a plural society devoid of much communal violence unlike the Hindi heartland. Hence, it is paramount that the Centre should concentrate more on the development and good governance rather than trying to impose its Hindutva philosophies.

With the general elections due next year, the BJP cannot afford to ignore the problems the northeast is facing. Of the 25 Lok Sabha seats from the region, Assam has the highest seats with 14 members. With BJP faring badly in the recent by-elections and many regional parties looking to go it alone in the coming elections, winning every seat will be important for Prime Minister Narendra Modi. After all, he and the party know well that the political loyalty in the northeast can change very fast.

Kuldip Nayar Memorial at Siri Fort

Kuldip Nayar Memorial at Siri Fort

परदेशी या वोट-बैंक

कुलदीप नैयर

भारतीय जनता पार्टी पूर्वोत्तर के सात में से छह राज्यों में अच्छी तरह जड़ जमा चुकी है। यह कुछ ऐसा है जिसकी कल्पना देश के विभाजन के लिए हो रही बातचीत के समय किसी ने नहीं की थी। उस समय के कांग्रेस के बड़े नेता फखरुद्दीन अली अहमद ने एक बार स्वीकार किया था कि ‘वोट के लिए’ पड़ोसी देशों जैसे पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश है, से मुसलमान असम लाए गए थे। उन्होंने यह भी कहा था कि कांग्रेस ने यह जानबूझकर किया, क्योंकि वह असम को अपने साथ रखना चाहती थी। इसने राज्य के लोगों के समक्ष गंभीर समस्या पैदा कर दी। उस समय से पूर्वोत्तर, खासकर असम में घुसपैठ की समस्या बहुत बड़ी चिंता बनी हुई है।

अवैध स्थानांतरण को रोकने की प्रक्रिया राष्ट्रीय और राज्य के स्तर पर काफी प्रयासों के बावजूद अधूरी ही रह गई। ध्यान रहे कि यह प्रक्रिया ब्रिटिश शासन के समय ही शुरू हो गई थी। बड़े पैमाने पर अवैध स्थानांतरण ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरण से संबंधित असर डाले और पूर्वोत्तर के लोग चिंता व्यक्त करने लगे। 1950 में असम से निष्कासन से संबंधित प्रवासी कानून पास हुआ। इसके तहत सिर्फ उन्हीं लोगों को रहने की अनुमति थी, जो पूर्वी पाकिस्तान में लोगों के उपद्रव के कारण विस्थापित हुए थे। बाकी लोगों को निकालने पर पश्चिमी पाकिस्तान में काफी विरोध हुआ। इसके बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत 1950 में देश से निकाले गए लोगों को वापस आने दिया गया।

चीन-भारत के बीच 1962 में हुए युद्घ के दौरान सरहद पर पाकिस्तानी झंडा लिए कुछ घुसपैठिये देखे गए। इसके कारण केंद्र सरकार ने 1964 में असम प्लान बनाया, लेकिन सत्तर के दशक में पूर्वी पाकिस्तान में जारी अत्याचार के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में शरणार्थियों का बेरोकटोक आना हुआ। इंदिरा गांधी-मुजीबुर रहमान के बीच 1972 के समझौते ने अवैध प्रवासियों को फिर से परिभाषित किया। इसके तहत 1971 के पहले आने वाले लोगों को गैर-बांग्लादेशी घोषित कर दिया गया।

असमिया लोगों ने इसका विरोध किया और आंदोलन करने लगे। इसके कारण 1983 में अवैध परदेशी कानून लागू हुआ। इस कानून का उद्देश्य एक ट्रिब्यूनल के जरिये अवैध परदेशियों की पहचान करना और उन्हें देश से बाहर निकालना था, लेकिन इससे भी पूर्वोत्तर में वर्षों से चली आ रही अवैध स्थानांतरण की समस्या का निपटारा नहीं हो सका। 1985 में असम समझौते के तुरंत बाद अवैध परदेशियों की पहचान के लिए अंतिम तारीख 25 मार्च, 1971 तय की गई। इसी दिन बांग्लादेश अस्तित्व में आया था। उक्त समझौते में कहा गया कि जो लोग उस दिन या उसके पहले यहां बस गए उन्हें नागरिक माना जाएगा और जो अवैध परदेसी उसके बाद आए उन्हें वापस भेज दिया जाएगा।

विद्रोही समूहों ने अखिल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू के बैनर तले इसके लिए आंदोलन शुरू कर दिया कि समझौते को रद कर दिया जाए और सभी परदेसियों को वापस भेजा जाए, चाहे वे किसी भी तारीख में आए हों। स्थानीय लोगों को फिर भी कोई राहत नहीं मिली, क्योंकि परदेसियों को चुपचाप राशन कार्ड दे दिए गए ओर उनके नाम वोटर लिस्ट में भी दर्ज कर दिए गए थे। बांग्लादेशी लोगों के बढ़ते दबदबे ने असम में परिस्थिति और बिगाड़ दी। एक आकलन के अनुसार क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है। 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया और उसने 1983 में अवैध परदेसी कानून को रद कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि इस कानून ने एक बड़ी समस्या पैदा कर दी है। उसके अनुसार यह कानून वस्तुत: अवैध परदेसियों को वापस भेजने में एक बड़ी बाधा है। इसके बाद भी बांग्लादेश से घुसपैठ बिना रुकावट के जारी रही और अवैध परदेसियों का मामला एक संवेदनशील मुद्दा बना रहा, जिसे राजनीतिक स्वार्थी तत्व इस्तेमाल करते रहे। पूर्वोत्तर के शांतिवादी और हिंसक समूहों, दोनों ने आंदोलन किए, लेकिन उन्हें कोई ठोस सफलता नहीं मिली। दुर्भाग्य से भाजपा सरकार 1955 के नागरिकता संबंधी कानून में इस तरह के बदलाव पर तुली है कि धार्मिक आधार पर सताए गए परदेसियों को ही नागरिकता दी जाएगी। इसका मतलब है कि उनके बीच सांप्रदायिक आधार पर भेद किया जाएगा।

असम के ज्यादातर लोग इसके खिलाफ हैं, क्योंकि समझौते के अनुसार 25 मार्च, 1971 के बाद बांग्लादेश से आए सभी अवैध परदेसियों को वापस भेजा जाना तय हुआ था। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह नगालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के साथ असम के सीमा संबंधी लंबित विवादों को सुलझाने के लिए कदम उठाए। अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी राज्य असम से ही अलग कर बनाए गए हैं। असम के अपने पड़ोसी राज्यों से जैसे सीमा विवाद हैैं कुछ वैसे ही मणिपुर के नगालैंड और मिजोरम के साथ भी हैं।

पूर्वोत्तर राज्यों के लोग देश की राजधानी समेत दूसरे हिस्सों में पूर्वोत्तर के लोगों, खासकर छात्रों को परेशान करने जैसे कई मुद्दों पर एक साथ हैं। उन्हें लगता है कि केंद्र सरकार पूर्वोत्तर को लेकर गंभीर नहीं। वे क्षेत्र के विकास में और भागीदारी चाहते हैं। बेशक विकास के कई कदम भाजपा ने उठाए हैं और वहां के लोगों से भावनात्मक जुड़ाव की कोशिश कर रही है, लेकिन आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट यानी अफस्पा असुविधा का एक बिंदु है। हालांकि कई इलाकों से इसे उठा लिया गया है, लेकिन इस बात को ध्यान में रखकर केंद्र और ज्यादा कर सकता है कि जमीन पर स्थिति सुधरी है। अगर घुसपैठ को रोकने और अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को वापस भेजने के जरूरी उपाय नहीं किए गए तो अवैध परदेसियों का मामला देश की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बना रहेगा।

सत्ताधारी भाजपा को यह ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी पट्टी के विपरीत पूर्वोत्तर का समाज विविधता वाला है। वहां सांप्रदायिक हिंसा नहीं है। केंद्र सरकार को सुशासन और विकास पर ध्यान देना चाहिए, न कि हिंदुत्व के दर्शन को फैलाने पर। अगले साल हो रहे आम चुनाव के मद्देनजर भाजपा पूर्वोत्तर की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती। असम में पूर्वोत्तर की सबसे ज्यादा 14 सीटें हैं। हाल के उपचुनावों में बुरे प्रदर्शन और ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों के अलग चुनाव लड़ने की संभावना को देखकर प्रधानमंत्री के लिए हर सीट को जीतना महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को मालूम होना चाहिए कि पूर्वोत्तर में लोग आसानी से पाला बदल लेते हैं।

Propoganda Against India

Kaushal Kishore | Follow @HolyGanga

Thomson Reuters Foundation has released the sensational report on most insecure nations for women on Tuesday, June 26. It promotes India as the most dangerous country all over the world so far security of womankind is concerned. Maneka Gandhi, Women & Child Development Minister of India has dismissed this rubbish altogether. The head of the foundation, Monique Villa has resorted to the referendum among the experts instead of making facts as a basis of the survey. Lots of criticisms–either in its opposition or in its favour–are available in the publications. Certain proponents of this report have assumed it as an ultimate reality only to raise it further. This so-called global survey or poll seems to be enough to produce an instant echo in the atmosphere. What is the reality of this report? What is actual outcome of the efforts of its proponents involved in this promotion. What are the receivings of the global foundations out of this rising reverberations. Only a few people are aware of its accurate impact. The contents available on social media platforms are further warming the scenario. After going through the contents of this report, anyone can assume how the surveyers have preferred to incarcerate all total 548 participants in the last house of the closed street in order to get the desired response to their single question.

The women from across the world have raised the problems arising out of discrimination and other difficulties from time to time. India is not an exception to it. Certain problems are here as well. But this report clearly states that India is worst so far as women’s security is concerned. The countries like Afghanistan, Congo, Syria and Somalia are better than India. Although this is the opinion of a group of the select experts, who believe the Indian culture and religion are inferior to that of all other countries.

This is an effort to humiliate the hard working women living across the length and breadth of India. They have presented certain data from the official records to prove their claims. A series of such facts are here. The unprecedented rise of 80% in the unpleasant acts against women between 2007 and 2016 and an average 40 such crimes are being reported per hour these days. They refer to the post gang rape protest of December 2012 that emerged in New Delhi. The strange coincidence here is that all these friends of Villa have forgotten to mention the protest launched by the proponents of the gender justice agenda, however, that was going on in the same city during the same year as well. The Supreme Court, while rejecting Delhi High Court verdict, had said that the change in the law is an intervention in the works of the Parliament. That day the people, who gathered to celebrate the victory have forgotten all the decency while marching on the roads against the unfavourable verdict of the court.

This is not the first survey of its type. Sometimes ago, one of the agencies of the same group has published other report. It said that one in every two women in India is a victim of sexual abuse in the family or home itself. Such reports are the outcome of a conspiracy. The history of this conspiracy exists till date. This lobby was found to be active in USA even before the World War I. They were campaigning there to propogate that East India Company is doing excellent works for the people of India. Lala Lajpat Rai, who was in exile during the war, came to know that while visiting America. He wrote a book i.e. Young India (1915) to counter British propoganda and to bring the facts before the American people. The publication of this book was banned for several years in India and Britain. Monique Villa is going to break all records of Katherine Mayo in future. She is all prepared to beat Mayo. A handful of people are still aware that the pompous American historian had written Mother India in 1927 to promote the British interest. She was offered the red carpet welcome during the colonial regime. Gandhiji has compared her book with the report of the drain inspector. The appropriate answer to it was given by Lala Lajpat Rai in another book i.e. Unhappy India that proved him to be one of the most prolific author of his time.

In 2011, the multinational corporations have funded a very special campaign that seems to promote women’s interests. The history of funding such schemes is not new at all. The CEO of Thompson Reuters Foundation has hetched a plan to that effect, and they have issued a press release on June 15, 2011 to declare Afghanistan, Congo, Pakistan, India and Somalia as the top five most dangerous nations for women across the world. Then they started the five-point campaign. The outcome of #MeToo initiative, a part of this campaign, is in public today. This has empowered them to such an extent that the list of ten most dangerous countries from India to the USA has been released in 2018. The political-economy of this issue is a very serious study. A few powerful people get benefits out of such efforts.

Dr. Onkar Mittal, convener of Bharatiya Jan Parshad Manch and President of SACH, has been involved in the study of this subject for many years. He has raised serious questions on the methodology of this survey report. The corporation of foreign origin needs to conduct such study in collaboration with certain institutions capable to understand the Indian scenario, culture and perspective. The proponents of such campaigns have sponsored the movement against Section 377 of the Indian Penal Code. He is quite straightforward while refering to it. They have spent the huge sum of 10,000 crore rupees in India alone in last decade. All sorts of moral and immoral means including deliberate contempt of the Supreme Court judgment are being reported from these people. Here Dr. Mittal asks a question; whether India is once again returning to the period of colonial regime that was known to be an empire of the emperor and command of the East India Company (Raj Badshah ka aur hukm Company Bahadur ka).

The Supreme Court has been hearing the case of women in distresss for more than a decade that started after the report from Vrindavan in Uttar Pradesh. More than 25000 single women in distress are in pictures. After the establishment of social justice bench the scope of this cases widened many fold. Now fifty million helpless single women from all over the nation are being addressed by the agencies. The govt. from states and centre are working on a comprehensive plan to launch special programs to ensure better life for all these distressed single women. I am surprised to know the fact that the institutions claim to be dedicated to address the problems of women in distress are justifying their apathy in this case.

Monique Villa is basically a journalist from France. She is known to have started her career with AFP in early 1990s. Her actual expertise is the consumate skill to raise funds for the benefit of society at large. As such I appeal to her to help the distressed single women of Vrindavan. I would like to offer an important suggestion for such surveys of the future as well. The Indian institutions best aware of the indigenous society and its culture may prove to be the meaningful help in such studies. As such it is necessary in my opinion to engage certain experts, who can decipher the verses from Jai Shankar Prasad’s Kamayani that reads: Nari tum keval shraddha ho, Vishwas rajat nag pag tal me/Piyush shrot si baha karo, jivan ke sundar samtal me. (O woman, you are only to be revered on the silver frame of trust beneath the floor / As such flow like the source of nectar, in the beautiful plane of life).

(Kaushal Kishore is the author of The Holy Ganga)